चप्पलें टूट जाती हैं हमारी
तुम्हारी बनायीं सड़कों पे
और तुम्हे कारें बदलने से फुरसत नही,
शाम के खाने का पता नही
मुल्क के करोड़ों लोग हैं ऐसे
और तुमने अपनी पुस्तों तक के लिए
अय्यासियों के बार में
हर शाम रिजर्व कर ली,
बेरोजगारों की बेरोजगारी न जाय
शराबियों की शराब न जाय
डूबे रहें सब अपने बदहाल में
किसी को फुरसत न हो
तुम्हारी असलियत देखने की
अच्छी चाल रची है तुमने,
हम आँवारा परिन्दे
मुहब्बत के दाने
चुगते रहे जमी पर
मगर हमारे जज्बात,
हमारी ख्वाइशों को डसने वाले
ऐ नेताओं
गर तुम साँप हो सकते हो
तो
हम भी बाज़ हो सकते हैं !!
हमारी ख्वाइशों को डसने वाले
ऐ नेताओं
गर तुम साँप हो सकते हो
तो
हम भी बाज़ हो सकते हैं !!
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